गीत
आनंद कुमार पांडेय

लिख रही है कलम

आज का ये जहाँ पहले जैसा कहाँ, रो-रो हर दास्ताँ लिख रही है कलम। याद बचपन की वो खेल मैदान की, माँ की वो लोरियां

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कविता
आनंद कुमार पांडेय

बेकार नहीं हैं हम

हमको भी ईश्वर ने अपने, हाथों से बनाया है अपने हाथों से मेरा सुंदर, रूप सजाया है मत कोस हमें तु बार-बार, शिकार नहीं हैं

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jindagi-ka-safar
गीत
आनंद कुमार पांडेय

जिंदगी का सफर

जिंदगी का सफर यूं बदल जाएगा, मैं न सोचा ये मौका निकल जाएगा। रंजिशें  तोड़ दो छोड़ दो ख्वाहिशें, क्या पता साथ क्या तेरे कल

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